रामगीता अध्यात्म रामायण के उत्तरकांड के पांचवें सर्ग में एक प्रसंग है। इस प्रसंग में लक्ष्मण जी श्रीराम से अज्ञानरूपी सागर को पार कराने वाले ज्ञानोपदेश देने की प्रार्थना करते हैं। तब श्रीरघुनाथजी उनको जो उपदेश देते हैं, वही 'रामगीता' कहलाती है।
{tocify} $title={Table of Contents}- आत्मज्ञान ही मोक्ष का मार्ग है।
- कर्म करते हुए फल की इच्छा नहीं करनी चाहिए।
- दुःख और सुख दोनों ही क्षणिक हैं।
- सत्य, अहिंसा, सदाचार और करुणा का पालन करना चाहिए।
- भगवान पर पूर्ण विश्वास रखना चाहिए।
- कर्म करते हुए फल की इच्छा नहीं करनी चाहिए।
रामगीता में श्रीराम कहते हैं, "फल की इच्छा से युक्त कर्मों से बंधन होता है, परन्तु फल की इच्छा से रहित कर्मों से बंधन नहीं होता है।" इसका अर्थ है कि जब हम कोई कर्म करते हैं, तो हमें केवल कर्म करने में ही ध्यान देना चाहिए, फल की प्राप्ति की चिंता नहीं करनी चाहिए। फल की इच्छा से युक्त कर्मों से हम संसार के बंधनों में बंध जाते हैं, जबकि फल की इच्छा से रहित कर्मों से हम मुक्त हो सकते हैं।- दुःख और सुख दोनों ही क्षणिक हैं।
रामगीता में श्रीराम कहते हैं, "दुःख और सुख दोनों ही क्षणिक हैं। दुःख के बाद सुख आता है और सुख के बाद दुःख आता है।" इसका अर्थ है कि इस संसार में जो कुछ भी होता है, वह क्षणिक है। दुःख और सुख भी क्षणिक हैं। दुःख के समय हमें धैर्य रखना चाहिए और सुख के समय हमें अहंकार नहीं करना चाहिए।- सत्य, अहिंसा, सदाचार और करुणा का पालन करना चाहिए।
रामगीता में श्रीराम कहते हैं, "सत्य, अहिंसा, सदाचार और करुणा का पालन करना चाहिए।" ये चारों गुण मनुष्य के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण हैं। सत्य का अर्थ है असत्य से बचना। अहिंसा का अर्थ है किसी को भी कष्ट न पहुँचाना। सदाचार का अर्थ है अच्छे कर्मों का पालन करना। करुणा का अर्थ है दूसरों के दुःखों को दूर करना।- भगवान पर पूर्ण विश्वास रखना चाहिए।
रामगीता में श्रीराम कहते हैं, "भगवान पर पूर्ण विश्वास रखना चाहिए।" भगवान ही इस संसार के सृष्टिकर्ता और पालनहार हैं। भगवान पर पूर्ण विश्वास रखने से हमें जीवन में सभी कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति मिलती है।रामगीता एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें दिए गए उपदेशों का पालन करने से हम अपने जीवन को सुखी और सफल बना सकते हैं।